बुधवार, 25 अप्रैल 2012


अछूत / रामकुमार वर्मा

"तू अछूत है - दूर !" सदा जो कह चिल्लाते
"मुझे न छू" कह नाक-भौंह जो सदा चढ़ाते 
दिन में दो-दो बार स्नान हैं करने वाले 
ऊपर तो अति शुद्ध किन्तु है मन में काले 
वे पंडित जी समझते हैं, पापी यही अछूत हैं 
किन्तु समझते हैं नहीं, एकलव्य के पूत हैं 


ये अछूत यदि काम आज से छोड़ें
अत्याचारी उक्त जनों के हाथ न जोड़ें 
प्रतिदिन इनके सदन झाड़ना यदि वे त्यागें 
वे भी अपना जन्म-स्वत्व यदि निर्भय माँगें 
तो फिर लगाने न पायेंगे, तिलक विप्र जी माथ में 
बस, लेना ही पड़ जायगी, डलिया-झाड़ू हाथ में 


इसीलिए मत शीघ्र मान लें गांधी जी का 
यह समाज है अंग हमारे जीवन का ही 
भेद-भाव सब दूर हटा कर गले लगाओ 
इन्हें शुद्र मत कहो पास इनको बिठलाओ 
धरा सजाने के लिए यही स्वर्ग के दूत हैं 
भाई हैं अपने सदा, नहीं दरिद्र अछूत हैं 

बुधवार, 21 मार्च 2012

धूप कोठरी के आइने में खड़ी / शमशेर बहादुर सिंह

धूप कोठरी के आइने में खड़ी
हँस रही है 
 
पारदर्शी धूप के पर्दे
मुस्कराते
मौन आँगन में 
 
मोम-सा पीला
बहुत कोमल नभ
 
एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को
बहुत नन्हा फूल
उड़ गई 
 
आज बचपन का
उदास माँ का मुख
याद आता है ।

मंगलवार, 20 मार्च 2012

भगवान के डाकिए / रामधारी सिंह "दिनकर"

पक्षी और बादल,
ये भगवान के डाकिए हैं
जो एक महादेश से
दूसरें महादेश को जाते हैं।
हम तो समझ नहीं पाते हैं
मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ
पेड़, पौधे, पानी और पहाड़
बाँचते हैं।

हम तो केवल यह आँकते हैं
कि एक देश की धरती
दूसरे देश को सुगंध भेजती है।
और वह सौरभ हवा में तैरते हुए
पक्षियों की पाँखों पर तिरता है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
और एक देश का भाप
दूसरे देश में पानी
बनकर गिरता है।

रविवार, 18 मार्च 2012



ऊँचाई / अटल बिहारी वाजपेयी


ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते, 
पौधे नहीं उगते, 
न घास ही जमती है। 
 
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, 
मौत की तरह ठंडी होती है। 
खेलती, खिलखिलाती नदी, 
जिसका रूप धारण कर, 
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। 
 
 
 
 
 
ऐसी ऊँचाई, 
जिसका परस 
पानी को पत्थर कर दे, 
ऐसी ऊँचाई 
जिसका दरस हीन भाव भर दे, 
अभिनंदन की अधिकारी है, 
आरोहियों के लिये आमंत्रण है, 
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
 
किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही, 
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है। 
 
सच्चाई यह है कि 
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,  
सबसे अलग-थलग, 
परिवेश से पृथक, 
अपनों से कटा-बँटा, 
शून्य में अकेला खड़ा होना, 
पहाड़ की महानता नहीं, 
मजबूरी है। 
ऊँचाई और गहराई में 
आकाश-पाताल की दूरी है। 
 
जो जितना ऊँचा, 
उतना एकाकी होता है, 
हर भार को स्वयं ढोता है, 
चेहरे पर मुस्कानें चिपका, 
मन ही मन रोता है। 
 
ज़रूरी यह है कि 
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो, 
जिससे मनुष्य, 
ठूँठ सा खड़ा न रहे, 
औरों से घुले-मिले, 
किसी को साथ ले, 
किसी के संग चले। 
 
भीड़ में खो जाना, 
यादों में डूब जाना, 
स्वयं को भूल जाना, 
अस्तित्व को अर्थ, 
जीवन को सुगंध देता है। 
 
धरती को बौनों की नहीं, 
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है। 
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें, 
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें, 
 
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं, 
कि पाँव तले दूब ही न जमे, 
कोई काँटा न चुभे, 
कोई कली न खिले। 
 
न वसंत हो, न पतझड़, 
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़, 
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा। 
 
मेरे प्रभु! 
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, 
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद / रामधारी सिंह "दिनकर"

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! 
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, 
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।  

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? 
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते; 
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी 
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।  
 
आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;
आज उठता और कल फिर फूट जाता है;
किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो? 
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है। 
 
मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली, 
देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू? 
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी? 
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू? 
 
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, 
आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ, 
और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की, 
इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।  

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी 
कल्पना की जीभ में भी धार होती है, 
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल, 
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है। 
 
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे, 
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को, 
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"  

गुरुवार, 15 मार्च 2012


मधुशाला / हरिवंशराय बच्चन


सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।
बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।
मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

बुधवार, 14 मार्च 2012

दीवारें बनाता बचपन

दीवारें बनाता ये बचपन कहीं इस दीवार में गुम न हो जाये
फूल सा कोमल ये मन  कहीं पत्थर सा कठोर न बन जाये

धूल और सीमेंट की परतों ने इसे  दानव सा जकड़ रखा है
किताबें  थामने वाले हाथों ने ईंटों का बोझ उठा रखा है

अस्थिर मन है इसका पर एक स्थिर दीवार बनाता है
मन के अँधेरे में उज्जवल भविष्य की आस बनाता है

                                  
                                                                                                 --अनकही

कोशिश करने वालों की / हरिवंशराय बच्चन

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
 
 डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
 
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

मंगलवार, 13 मार्च 2012

Anna Razumovskaya's painting


aks-e-khushboo: तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा / परवीन शाकिर...

aks-e-khushboo: तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा / परवीन शाकिर...: बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा इस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश फिर शाख़ पे उस फूल को खिल...

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा / परवीन शाकिर

बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा 
इस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा 
इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश
फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा 
यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं 
जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा
काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली 
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा 
किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर 
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा

जाग तुझको दूर जाना / महादेवी वर्मा

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!
अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले!
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया
जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!
बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!
वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया,
दे किसे जीवन-सुधा दो घँट मदिरा माँग लाया!
सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?
विश्व का अभिशाप क्या अब नींद बनकर पास आया?
अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?
जाग तुझको दूर जाना!
कह न ठंढी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियां बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!

सोमवार, 12 मार्च 2012


बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना

बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना 
मैं समन्दर देखती हूँ तुम किनारा देखना 
यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर 
जाते जाते उस का वो मुड़ के दुबारा देखना 
किस शबाहत को लिये आया है दरवाज़े पे चाँद 
ऐ शब-ए-हिज्राँ ज़रा अपना सितारा देखना 
आईने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिये 
जाने अब क्या क्या दिखायेगा तुम्हारा देखना 
                   - परवीन शाकिर 

अक़्स-ए-ख़ुशबू

अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊँ तो, मुझ को न समेटे कोई
काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई में
मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई
जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ा
इस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई
- परवीन शाकिर