अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई और बिखर जाऊँ तो, मुझ को न समेटे कोई काँप उठती हूँ मैं सोच कर तन्हाई में मेरे चेहरे पर तेरा नाम न पढ़ ले कोई जिस तरह ख़्वाब हो गए मेरे रेज़ा-रेज़ा इस तरह से, कभी टूट कर, बिखरे कोई
- परवीन शाकिर
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