बुधवार, 21 मार्च 2012

धूप कोठरी के आइने में खड़ी / शमशेर बहादुर सिंह

धूप कोठरी के आइने में खड़ी
हँस रही है 
 
पारदर्शी धूप के पर्दे
मुस्कराते
मौन आँगन में 
 
मोम-सा पीला
बहुत कोमल नभ
 
एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को
बहुत नन्हा फूल
उड़ गई 
 
आज बचपन का
उदास माँ का मुख
याद आता है ।

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