धूप कोठरी के आइने में खड़ी हँस रही है
पारदर्शी धूप के पर्दे मुस्कराते मौन आँगन में
मोम-सा पीला बहुत कोमल नभ
एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को बहुत नन्हा फूल उड़ गई
आज बचपन का
उदास माँ का मुख याद आता है ।
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