मंगलवार, 13 मार्च 2012

aks-e-khushboo: तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा / परवीन शाकिर...

aks-e-khushboo: तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा / परवीन शाकिर...: बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा इस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश फिर शाख़ पे उस फूल को खिल...

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